उत्तराखण्ड के चूल्हे मेहनत, संघर्ष और यहां के जवानों के बलिदान से जलते हैं, किसी के एहसान से नहीं
प्रदीप सिंह चौहान।
उत्तराखण्ड को देवभूमि कहा जाता है। यह वह धरती है जहां पहाड़ हैं, गंगा है, आस्था है, संघर्ष है और सबसे बढ़कर आत्मसम्मान है। यहां आने वाले हर व्यक्ति का स्वागत खुले दिल से किया जाता है। चाहे वह चारधाम यात्रा पर आने वाला श्रद्धालु हो, हरिद्वार में गंगा स्नान करने वाला यात्री हो या पहाड़ों की वादियों में सुकून तलाशने वाला पर्यटक सभी के लिए उत्तराखण्ड ने हमेशा अपने दरवाजे सबके लिए खुले रखे हैं। लेकिन उत्तराखण्ड के चूल्हे मेहनत, संघर्ष और यहां के जवानों के बलिदान से जलते हैं, किसी के एहसान से नहीं।
लेकिन हाल ही में हरियाणा के एक यूट्यूबर हर्ष छिकारा के उस बयान ने उत्तराखण्ड के लोगों को भीतर तक आहत कर दिया, जिसमें कथित तौर पर कहा गया कि “हरिद्वार और ऋषिकेश के चूल्हे हरियाणा वाले चलाते हैं, अगर वे आना बंद कर दें तो लोग भूखे मर जाएंगे।” यह सिर्फ एक बयान नहीं था, बल्कि पहाड़ के स्वाभिमान को छूने वाली बात बन गई।
शायद जो लोग पहाड़ को केवल घूमने की जगह समझते हैं, वे यहां की जिंदगी का सच नहीं जानते। यहां सुबह का सूरज अक्सर किसी मां के सिर पर घास का भारी गठ्ठरा लेकर निकलने से शुरू होता है। यहां की महिलाएं कई किलोमीटर पैदल चलकर पानी, लकड़ी और पशुओं के लिए चारा लाती हैं। यहां का किसान कठिन ढलानों पर खेती करता है, जहां हर मौसम चुनौती है।
उत्तराखण्ड का युवा अक्सर रोजगार की तलाश में घर छोड़ देता है। गांव खाली हो रहे हैं, लेकिन पहाड़ अब भी अपने आत्मसम्मान के साथ खड़ा है। सीमाओं पर देश की रक्षा करने वाले सैनिकों में उत्तराखण्ड का योगदान किसी से छिपा नहीं। ऐसे प्रदेश के लोगों से यह कहना कि उनके “चूल्हे” किसी दूसरे राज्य की वजह से जलते हैं, एक सामान्य टिप्पणी नहीं बल्कि स्वाभमान पर आघात है।
यह भी सच है कि पर्यटन उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर साल लाखों श्रद्धालु और पर्यटक यहां आते हैं। होटल चलते हैं, टैक्सी चलती हैं, छोटे व्यापारियों की रोजी-रोटी चलती है। स्थानीय लोग इसका सम्मान करते हैं और यही कारण है कि यहां “अतिथि देवो भव” केवल कहावत नहीं, संस्कृति है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी राज्य में घूमने जाना यह अधिकार दे देता है कि वहां के लोगों के आत्मसम्मान पर टिप्पणी की जाए? क्या धार्मिक यात्रा या पर्यटन को “अहसान” की भाषा में देखा जाना चाहिए? उत्तराखण्ड का व्यक्ति इस सोच से असहज है।
सोशल मीडिया पर उत्तराखण्ड के लोगों की प्रतिक्रिया में गुस्से के साथ पीड़ा भी दिखी। कई लोगों ने लिखा “हम कम में भी जी लेते हैं, लेकिन किसी के आगे हाथ फैलाकर नहीं।” कुछ ने कहा “गंगा हजारों वर्षों से बह रही है, यहां की संस्कृति और आस्था किसी एक राज्य के पर्यटकों पर निर्भर नहीं है।”
यह प्रतिक्रिया केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि उस दर्द की आवाज भी है जो पलायन, बेरोजगारी और कठिन जीवन के बीच भी अपने स्वाभिमान को बचाए रखने वाले पहाड़ के मन में छिपी रहती है।
अगर किसी पर्यटक के साथ कोई गलत व्यवहार हुआ है, तो उसका विरोध होना चाहिए और कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन एक घटना के कारण पूरे प्रदेश या उसके लोगों को इस तरह पेश करना कि वे किसी के भरोसे हैं यह बात उत्तराखण्ड के लोगों को स्वीकार नहीं।
उत्तराखण्ड के लोग शायद यही कहना चाहते हैं “हम आपका स्वागत करते हैं, सम्मान देते हैं, आपको अपना मानते हैं। लेकिन हमारे आत्मसम्मान को कम मत आंकिए। यहां के चूल्हे मेहनत से जलते हैं, संघर्ष से जलते हैं, और उन जवानों के बलिदान से जलते हैं जो सीमा पर खड़े होकर पूरे देश की रक्षा करते हैं।” क्योंकि उत्तराखण्ड केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भावनाओं, संघर्ष और स्वाभिमान की धरती है।

