देहरादून दुष्कर्म मामला: अदालत ने विदेशी छात्र को बरी किया, ज़ीरो एफआईआर जांच पर पुलिस को फटकार
देहरादून की एक अदालत ने एक विदेशी छात्र पर लगे दुष्कर्म के आरोपों से उसे बरी कर दिया है और ज़ीरो एफआईआर के तहत की गई पुलिस जांच को गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण बताया है। यह मामला अक्टूबर 2024 में दिल्ली के कश्मीरी गेट थाने में ज़ीरो एफआईआर के रूप में दर्ज किया गया था, जिसे बाद में जांच के लिए देहरादून स्थानांतरित किया गया। अदालत ने कहा कि कमजोर और गैर-वैज्ञानिक जांच के कारण अभियोजन पक्ष अपना मामला साबित नहीं कर सका।
शुक्रवार को फैसला सुनाते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि क्लेमेंट टाउन पुलिस द्वारा की गई जांच में बुनियादी वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। अदालत के अनुसार, जांच अधिकारी ने फॉरेंसिक मानकों की अनदेखी की, जिससे मामले की विश्वसनीयता कमजोर हुई और इसका सीधा लाभ आरोपी को मिला। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में साक्ष्यों का वैज्ञानिक तरीके से संकलन बेहद आवश्यक होता है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता दक्षिण अफ्रीका की नागरिक है और देहरादून के एक निजी विश्वविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई कर रही थी। उसने आरोप लगाया था कि एक विदाई पार्टी के बाद, जब वह सो रही थी, तब उसके साथ यौन उत्पीड़न किया गया। आरोपी की पहचान दक्षिण सूडान के नागरिक मूसा उर्फ मोजा मोजिज लाडू जेम्स के रूप में हुई थी, जिसे शिकायत के आधार पर गिरफ्तार किया गया था।
हालांकि अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश रजनी शुक्ला ने सभी आरोपों से आरोपी को बरी करते हुए तत्कालीन जांच अधिकारी उपनिरीक्षक संजीत कुमार पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि नींद के दौरान दुष्कर्म के आरोप होने के बावजूद पुलिस ने घटनास्थल से बेडशीट, कपड़े या अन्य भौतिक साक्ष्य जब्त नहीं किए। अदालत के अनुसार यह जांच की एक बुनियादी प्रक्रिया है, जिसकी अनदेखी गंभीर लापरवाही मानी जाती है।
जिरह के दौरान पीड़िता ने स्वीकार किया कि पार्टी में उसने और उसके दोस्तों ने शराब का सेवन किया था और उसे यह स्पष्ट रूप से याद नहीं था कि किसने और किस समय उसे छुआ। पार्टी में मौजूद अन्य विदेशी छात्रों ने भी बयान दिया कि आरोपी और पीड़िता अलग-अलग कमरों में सोए थे। एक गवाह ने अदालत को बताया कि उसने रात में पीड़िता की आवाज सुनी थी, लेकिन उसे लगा कि यह किसी बुरे सपने के कारण हो सकता है और उस समय आरोपी उसके कमरे में मौजूद नहीं था।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि जांच में खामियों और सहायक साक्ष्यों के अभाव के कारण अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। इस फैसले ने एक बार फिर ज़ीरो एफआईआर के तहत स्थानांतरित मामलों में जांच की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर तब जब समय पर और वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य एकत्र नहीं किए जाते।
